हेपाटाइटिस
हेपाटाइटिस या यकृत शोथ यकृत को हानि पहुंचाने वाला एक गंभीर और खतरनाक रोग होता है। इसका शाब्दिक अर्थ ही यकृत को आघात पहुंचना है।
इसके प्रमुख लक्षणों में अंगो के उत्तकों में सूजी हुई कोशिकाओं की उपस्थिति आता है, जो आगे चलकर पीलिया का रूप ले लेता है। यह स्थिति स्वतः नियंत्रण वाली हो सकती है, यह स्वयं ठीक हो सकता है, या यकृत में घाव के चिह्न रूप में विकसित हो सकता है। हैपेटाइटिस अतिपाती हो सकता है, यदि यह छः महीने से कम समय में ठीक हो जाये। अधिक समय तक जारी रहने पर चिरकालिक हो जाता है और बढ़ने पर प्राणघातक भी हो सकता है।
हेपाटाइटिस विषाणुओं के रूप में जाना जाने वाला विषाणुओं का एक समूह विश्व भर में यकृत को आघात पहुंचने के अधिकांश मामलों के लिए उत्तरदायी होता है। हेपाटाइटिस जीवविषों (विशेष रूप से शराब (एल्कोहोल)), अन्य संक्रमणों या स्व-प्रतिरक्षी प्रक्रिया से भी हो सकता है। जब प्रभावित व्यक्ति बीमार महसूस नहीं करता है तो यह उप-नैदानिक क्रम विकसित कर सकता है।
यकृत यानी लिवर शरीर का एक महत्वपूर्ण अंग है। वह भोजन पचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शरीर में जो भी रासायनिक क्रियाएं एवं परिवर्तन यानि उपापचय होते हैं, उनमें यकृत विशेष सहायता करता है। यदि यकृत सही ढंग से अपना काम नहीं करता या किसी कारण वे काम करना बंद कर देता है तो व्यक्ति को विभिन्न प्रकार के रोग हो सकते हैं। जब रोग अन्य लक्षणों के साथ-साथ यकृत से हानिकारक पदार्थों के निष्कासन, रक्त की संरचना के नियंत्रण और पाचन-सहायक पित्त के निर्माण में संलग्न यकृत के कार्यों में व्यवधान पहुंचाता है तो रोगी की तबीयत ख़राब हो जाती है और वह रोगसूचक हो जाता है।
ये बढ़ने पर पीलिया का रूफ लेता है और अंतिम चरण में पहुंचने पर हेपेटाइटिस लिवर सिरोसिस और यकृत कैंसर का कारण भी बन सकता है।
समय पर उपचार न होने पर इससे रोगी की मृत्यु तक हो सकती है।
साइलेंट किलर हैपेटाइटिस का मुकाबला करें आयुर्वेद से
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हैपेटाइटिस देश में साइलैंट किलर के रूप में तेजी से फैलता जा रहा है। हर साल देश में हैपेटाइटिस की वजह से लगभग 4 लाख लोगों की मौत हो जाती है। हैपेटाइटिस के इलाज में जितनी कारगर दवाइयां हैं उतना ही कारगर आयुर्वेदिक इलाज भी है।
हैपेटाइटिस के पांचों प्रकार के इलाज के लिए कुछ मामूली से घरेलू नुस्खे हैं जिनके इस्तेमाल से इससे मुकाबला किया जा सकता है।हैपेटाइटिस मुख्य रूप से शराब, संक्रमण,कोशिकाओं में सूजन और कभी-कभी औषधियों के दुष्प्रभाव से भी होने का खतरा रहता है।
हैपेटाइटिस को 2 भागों में रखे गए हैं एक्स और जी। हैपेटाइटिस-ए, संक्रमित भोजन एवं पानी के सेवन से हो सकता है। हैपेटाइटिस-बी यौन संक्रमण होने से हो सकता है।
हैपेटाइटिस-सी किसी संक्रमित व्यक्ति के साथ सीधे खून का आदान-प्रदान करने से होता है, जो व्यक्ति हैपेटाइटिस-बी से संक्रमित है, वह व्यक्ति हैपेटाइटिस-डी से भी संक्रमित हो सकता है।
संक्रमित पानी के सेवन से हैपेटाइटिस-ई सामान्य व्यक्ति को हो सकता है। हैपेटाइटिस-ए,बी, सी,डी,और ई को वाइरस नहीं ठहराया जा सकता है, इसे हैपेटाइटिस एक्स कहते हैं। हैपेटाइटिस-जी का परोक्ष लक्षण फ्लू, दस्त, थकान इत्यादि और वजन का घट जाना हैं, लीवर शरीर का सबसे व्यस्तम अंग है।
मानव शरीर के सभी अंगों में लीवर सबसे बड़ी ग्रंथि है, जो सबसे ज्यादा कार्य करती है। उत्पादन और पित्त स्राव के पाचन के लिए फैटी एसिड प्रयोग करती है। रक्त प्रोटीन का उत्पादन व सैकड़ों एंजाइम का पाचन तथा शरीर के अन्य कार्यों को सम्पूर्ण करती है।
शरीर से विषैले प्रदार्थों को कचरे में परिवर्तित करके नष्ट करना। लिवर हमारे स्वस्थ को मेंटेन रखने में अहम भूमिका निभाता है। हमें इन सभी को अपने लीवर का ध्यान रखना चाहिए।
डाक्टर प्रताप चौहान, आयुर्वेदाचार्य एंड डायरैक्टर जीवा आयुर्वेद बताते हैं कि लीवर में यदि सूजन हो जाए तो इसमें हैपेटाइटिस के लक्षण प्रतीत होने लगते हैं, जिसकी वजह से यह लीवर का सबसे बड़ा दुश्मन बन जाता है।
हैपेटाइटिस के कुछ लक्षण हैं, जैसे अत्यधिक कमजोरी व थकान, भूख में कमी, पाचन समस्याओं जैसे उल्टी, आंख, जीभ, मूत्र व त्वचा में पीलापन महसूस होने से हैपेटाइटिस होने का अनुमान लगाया जा सकता है।
